Wednesday, 21 June 2017

मध्यान्ह का सूर्य


एक  दिन दोपहर  मिली
बड़ी बुझी -बुझी
अपने ही कन्धों पर झुकी -झुकी
ऐसा क्यों ?
रथ  का पहिया कभी उलटा चला था
उसे उसके  सारथी ने ही छला था
क्या करती ..
धूप के लूटने का डर था
आदमी की नज़र में भ्रमर था
फूलों के पथ में बिछे थे अंगारे
नही कोई था जो नाम को पुकारे
बस कंधे झुकाकर सांझ का लबादा ओढ़ लिया
और दोपहर को आँखों में भींच लिया
लाठी के साथ पाँव बाँध लिए
बस इसी तरह उम्र काट लिए
और मध्यान्ह का सूर्य बिलखता रहा ........
*
रामकिशोर उपाध्याय


4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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